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एम्निओटिक द्रव: शिशु की तरल गोद

Author: Dr. Divya Pandey, Radiologist

A health education article as part of Samrakshan, a national program of IRIA to reduce avoidable deaths of babies during pregnancy in India, led by Dr Rijo Mathew Choorakuttil and a dedicated team of Fetal Radiologists in India.

गर्भावस्था के दौरान भ्रूण का लालन-पालन एवम् पोषण एम्निओन एवं कोरिओन नामक विशिष्ट झिल्लियों के भीतर होता हैI 

      गर्भस्थ शिशु इन झिल्लियों के भीतर जिस तरल से चारों ओर घिरा रहता है, उसे एम्निओटिक द्रव कहते हैI यह एम्निओटिक द्रव गर्भाधान से लेकर शिशु जन्म तक की सम्पूर्ण अवधि में भ्रूण के विकास, संवर्धन, उत्सर्जन, पोषण में अहम भूमिका निभाता हैI इसकी महत्ता इस बात से समझी जा सकती है कि गर्भ के भीतर का अतिमहत्वपूर्ण वातावरण गर्भनाल, अपरा अर्थात् प्लासेन्टा एवम् एम्निओटिक द्रव, यही तीनों मिलकर  बनाते हैंI और जिस तरह हमारा दैनन्दिन जीवन हमारे पर्यावरण से गहरा प्रभावित होता है, उसी प्रकार एम्निओटिक द्रव भी भ्रूण के समुचित विकास पर बहुआयामी प्रभाव डालता हैI 

संरचना एवम् निर्माण:

गर्भाधान के आरंभिक हफ़्तों में एम्निओटिक द्रव की संरचना मातृ-प्लाज्मा समरूप होती हैI जल एवम् लवण स्वतंत्र रूप से भ्रूणीय त्वचा के आर-पार विसरित होकर सान्द्रता संतुलित रखते हैंI लेकिन दूसरी तिमाही के पश्चात् त्वचा का किरेटिनीकरण आरम्भ होने से त्वचा द्वारा विसरण की प्रक्रिया अवरूद्ध हो जाती है, इस समय तक भ्रूण में गुर्दे भी मूत्र निर्माण में सक्षम हो जाते हैंI अत: अब एम्निओटिक द्रव का मुख्य अवयव भ्रूण द्वारा उत्सर्जित मूत्र होता हैI 

   निर्माण के साथ-साथ एम्निओटिक द्रव का भ्रूण द्वारा नियमित निगलन एवम् श्वसन-प्रक्रिया सम्बन्धित अवशोषण इस तरल की मात्रा को संतुलित बनाये रखता हैI  यह दसवें सप्ताह में लगभग पच्चीस मिलीलीटर, बीसवें सप्ताह तक लगभग चार सौ मिलीलीटर और छतीस सप्ताह की गर्भावस्था के आसपास आठ सौ से हज़ार मिलीलीटर तक पहुंच जाता है। अड़तीस सप्ताह के बाद यह धीरे-धीरे कम होना शुरु हो जाता है।

एम्निओटिक द्रव का कार्य:

– यह भ्रूण को चारों ओर से घेरकर एक तकिया अथवा सदमा-अवशोषक के रूप में कार्य करता है और इसे बाहरी झटके से बचाता है।

– इस तरल से झिल्लियों के फैलाव के फलस्वरूप भ्रूण के माँसपेशीय एवम् कंकाल-विकास  को बढ़ावा मिलता है।

– एम्निओटिक द्रव में उपस्थित विभिन्न रसायन भ्रूण के सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैंI इसमें उपस्थित एंटीबॉडी भ्रूण को विभिन्न संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करती हैंI 

– एम्निओटिक द्रव भ्रूण का तापमान नियमित बनाए रखने में भी सहायता करता है।

– भ्रूण द्वारा एम्निओटिक द्रव का निगलन पाचन-तंत्र के गठन में मदद करता है।

– बच्चे के आनुवांशिक स्वास्थ्य सम्बन्धित संशय की स्थिति में एम्निओटिक द्रव का विश्लेषण कर गुणसूत्रीय विकारों का पता लगाया जा सकता है I 

– चूंकि एम्निओटिक द्रव का निर्माण शिशु के उत्सर्जन तंत्र पर निर्भर है तथा निकास मुख्यत: इसके निगलन पर अत: इसकी मात्रा के न्यून-अधिक होने की स्थिति इन तंत्रों की असामान्यता की जांच की आवश्यकता को इंगित करती हैI 

एम्निओटिक द्रव सम्बन्धी समस्याएँ एवम् जाँचे:

आमतौर पर एम्निओटिक द्रव से जुड़ी परेशानी उसकी मात्र के न्यून अथवा अधिक होने से होती हैI इसका पता आसानी से गर्भावस्था के दौरान करवाई जाने वाली नियमित अल्ट्रासोनोग्राफी जाँच से चल सकता हैI 

अल्ट्रासोनोग्राफी एक ऐसी जाँच है जिसमें अत्यधिक आवृति वाली ध्वनि तरंगों के उपयोग से भ्रूण की संरचना एवं आंतरिक वातावरण को परखा जा सकता हैI ये ध्वनि तरंगें भ्रूण के लिए हानिकारक नहीं होती। 

एम्निओटिक द्रव-मापन सम्बन्धी ये जाँचें मुख्यत: दो प्रकार की होती हैंI 

  • पहली जिसमें कि एम्निओटिक द्रव की मात्रा का आंकलन एम्निओटिक फ्लूइड इंडेक्स (ए.एफ़.आई.) के ज़रिये किया जाता हैI 

     इसके लिए गर्भवती महिला को पीठ के बल काउच पर लेटना होता हैI एम्निओटिक द्रव के आयतन को मापने के लिए डॉक्टर महिला के उदर को (निम्नांकित चित्र के अनुसार) दो काल्पनिक रेखाओं द्वारा चार बराबर हिस्सों में बाँटकर बारी-बारी से अल्ट्रासाउंड ट्रांसड्यूसर की सहायता से एम्निओटिक द्रव का परीक्षण करते हैंI 

दूसरी जाँच प्रक्रिया में एम्निओटिक द्रव के सर्वाधिक गहरे प्रकोष्ठ को मापा जाता है, जिसे सिंगल डीपेस्ट वर्टीकल पॉकेट (एस.डी.वी.पी.) कहते हैंI 

  • सामान्य स्तर : एम्निओटिक फ्लूइड इंडेक्स (ए.एफ़.आई.) 5 से 25 सेंटीमीटर तक तथा सिंगल डीपेस्ट वर्टीकल पॉकेट (एस.डी.वी.पी.) २ से 8 सेंटीमीटर, सामान्य स्तर के अंतर्गत आते हैंI 
  • ओलिगोहाइड्रेमनियोस : यह स्थिति तब आती है, जब एम्निओटिक फ्लूइड इंडेक्स (ए.एफ़.आई.) 5 सेंटीमीटर से कम तथा सिंगल डीपेस्ट वर्टीकल पॉकेट (एस.डी.वी.पी.) २ सेंटीमीटर से कम होती हैI 
  • पॉलीहाइड्राम्निओस : यह वह स्थिति है, जब एम्निओटिक फ्लूइड इंडेक्स (ए.एफ़.आई.) 25 सेंटीमीटर से अधिक तथा सिंगल डीपेस्ट वर्टीकल पॉकेट (एस.डी.वी.पी.) 8 सेंटीमीटर से अधिक होती हैI 

ओलिगोहाइड्रेमनियोस- कारण,लक्षण,उपचार:

कारण:

  • अमूमन इसका सबसे मुख्य कारण समय पूर्व भ्रूणीय झिल्लियों का फट जाना है  जिससे एम्निओटिक द्रव का रिसाव शुरू हो जाता हैI 
  • गर्भावस्था का शिशु के जन्म की नियत तिथि से आगे बढ़ जाना, जिसे आम बोलचाल की भाषा में ओवर-डयू कहा जाता हैI 
  • अपरा-सम्बन्धी समस्या (प्लेसेंटल इनसफिशिएंसी) का होनाI 
  • कुछ विशेष तरह की दवाइयाँ एम्निओटिक द्रव के स्तर को कम कर सकती हैंI 
  • चूंकि एम्निओटिक द्रव का निर्माण मुख्यत: उत्सर्जन-तंत्र पर निर्भर करता है अत: यदि शिशु की मूत्र प्रणाली में कोई आनुवांशिक समस्या है तो वह भी इसके स्तर को कम कर देगीI 

लक्षण: 

  • एम्निओटिक द्रव का रिसाव होनाI 
  • गर्भाशय का आकर नियत गर्भावस्था से कम दिखाई देनाI  
  • माँ के वजन में औसत से कम बढ़ोतरी का होनाI 
  • गर्भ में अधिक खिंचाव, परेशानी का रहनाI 

प्रभाव:

  • शुरुवाती हफ़्तों में ऐसा होने से गर्भपात होने की संभावना बढ़ जाती है।
  • शिशु के फेफड़े, मांसपेशियाँ, त्वचा, इत्यादि सामान्य रूप से विकसित नहीं हो पातेI
  • आख़िरी तिमाही में यह मृत शिशु के जन्म (स्टिलबर्थ) का कारण बन सकता है।
  • एम्निओटिक द्रव कम होने की वजह से प्रसव में जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। पर्याप्त स्थान न मिलने से शिशु सिर ऊपर और नितंब नीचे यानि की ब्रीच, अथवा किसी और असामान्य पोजीशन में भी हो सकता हैI 
  • एम्निओटिक द्रव का स्तर कम होने से जन्म के दौरान शिशु की गर्भनाल भी दब सकती है।

    उपचार
  • ऐसे में माँ का समुचित मात्र में पानी पीना बहुत ज़रूरी हो जाता हैI हाइड्रेशन शरीर में प्राकृतिक रूप से एम्निओटिक द्रव के निर्माण में सहायक होती हैI
  • एम्निओफ्यूजन : इस उपचार में डॉक्टर गर्भाशय के भीतर कैथेटर के माध्यम से एम्निओटिक थैली में उपयुक्त रसायन प्रविष्ट करते हैं।
  • तरल इंजेक्शन/ एम्निओसेंटेसिस : इसमें सुई की सहायता से तरल को गर्भ तक पहुँचाया  जाता है। 
  • आराम : यदि ओलिगोहाइड्रेमनियोस की समस्या हल्की-सी है, तो डॉक्टर आराम करने की सलाह देते हैं। हाइड्रेशन और आराम इंट्रावैस्कुलर स्थान बढ़ाने में मदद करते हैं।

पॉलीहाइड्रेमनियोस- कारण,लक्षण,उपचार:

कारण:

  • भ्रूण सम्बन्धी असामान्यता: गर्भ के अंदर भ्रूण एम्निओटिक द्रव को निगल कर फिर उसे बाहर निकाल देता हैं, इससे एम्निओटिक द्रव की मात्रा स्थिर रहती है। वहीं अगर बच्चा किसी समस्या के कारण जैसे कि भोजन नाली का एक सिरा बंद होना, होंठ अथवा तालू का पूरा न बन पाना अथवा मांसपेशीय कमजोरी के कारण इसे निगल नहीं पाता है, तो एम्निओटिक द्रव का स्तर बढ़ जाता है।
  • गर्भावधि-मधुमेह: रक्त में शर्करा के अधिक स्तर के कारण प्लाज्मा-सांद्रता अधिक होने से भी ज़्यादा एम्निओटिक द्रव का निर्माण हो सकता है। 
  • संक्रमण: कभी-कभी भ्रूण में संक्रमण के कारण भी एम्निओटिक द्रव अधिक बनना शुरू हो सकता है।
  • ट्विन-टू-ट्विन ट्रांसफ्यूजन सिंड्रोम (टीटीटीएस) – अगर आपके गर्भ में जुड़वां बच्चे हैं, तो आपको यह समस्या हो सकती है। इसमें एक भ्रूण को अधिक रक्त मिलता है, जबकि दूसरे को कम।

लक्षण:

  • गर्भाशय का आकर नियत गर्भावस्था से अधिक दिखाई देनाI  
  • माँ के वजन में औसत से अधिक बढ़ोतरी का होनाI 
  • गर्भवती महिला को सांस लेने में तकलीफ होनाI 
  • अत्यधिक दवाब के कारण नियत समय से पहले ही एम्निओटिक थैली का फटना और एम्निओटिक द्रव का रिसाव होना।
  • प्रसव-पश्चात योनि से अत्यधिक रक्तस्राव होना, जिसे पोस्ट-पार्टम हेमोरेज कहा  जाता हैI 

प्रभाव:

  • समय से पहले ही प्रसव का हो जाना, जिसे प्रीटर्म लेबर कहा जाता हैI 
  • गर्भाशय में भ्रूण की असामान्य स्थिति।
  • प्रसव के दौरान गर्भनाल का फंस जानाI 
  • प्रसव के पहले या प्रसव के दौरान शिशु की मृत्यु अथवा स्टीलबर्थI

उपचार:

  • एम्निओरिडक्शन प्रक्रिया: इसमें अतिरिक्त फ्लूइड को सोनोग्राफी जाँच की देखरेख में  निकाल दिया जाता है। 
  • कुछ औषधियों जैसे कि नॉनस्टेरॉइडल एंटी-इनफ्लेमेटरी दवाइयों के ज़रिये एम्निओटिक द्रव की मात्रा को कम किया जा सकता है। 
  • अत: बेहद ज़रूरी है कि आप भ्रूण के देखभाल और रखरखाव से अंतरंगता से जुड़े एम्निओटिक द्रव की आपके चिकित्सक द्वारा बतलाये गये निश्चित समय-अन्तराल पर जाँच अवश्य करवाएं ताकि समय रहते भ्रूण के सम्यक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए आपके प्रसव की तैयारी की जा सकेI 

      साथ-ही-साथ किसी विकार की स्थिति में उससे निपटने की व्यवस्था जैसे कि मेडिकल, सर्जिकल उपचार या फिर शिशु के लिए जन्म के तुरंत बाद सघन देखभाल कक्ष भी पहले से ही तैयार होI  

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