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Importance of Ultrasound Assessment in the 1st trimester

By Dr. Akanksha Baghel, Samrakshan Harda, Madhya Pradesh

एक गर्भवती महिला और उसके परिजनों के मन में गर्भावस्था को लेकर बहुत सी दुविधायें और सवाल होते हैं, इन्हीं में से कुछ सवाल लेकर पहली बार और अभी अभी मातृ सुख को प्राप्त एक गर्भवती महिला अपनी गर्भावस्था की शुरुआती दुविधाओं को साझा करने और उनके निवारण की आस से मेरे पास आयीं, बातचीत के दौरान उनकी जो भी दुविधायें थीं और जो संवाद हमारे बीच हुए एक डॉक्टर होने के नाते स्वास्थ्य शिक्षा जागरूकता के उद्देश्य से वो मैं आप सभी से साझा करना चाहती हूँ …..

प्रश्न 1)  मेरे महीने चढ़ गए हैं, मुझे सोनोग्राफी के लिए कब आना चाहिए ?

पहले तो मातृसुख की आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और इस गर्भावस्था की संपूर्ण यात्रा मंगलमय हो इसके लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।  ये एक अच्छा प्रश्न है, जो आपने पूंछा । आम तौर पर जैसे ही महीने चढ़ते है, तो इसकी पुष्टि के लिए महिलाएं सामान्यतः  पिशाब के माध्यम से होने वाली  यूरिन प्रेगनेंसी किट टेस्ट का घर पर ही प्रयोग करती हैं या फिर एक प्रसूति विशेषज्ञ की सलाह लेतीं हैं । देखा जाए तो अल्ट्रासाउंड परीक्षण महीने चढ़ने के लगभग 5 से 7 सप्ताह की अवधि के बीच करवाना अच्छा होता है, (याद रखिये कि महीने चढ़ने की गिनती उस तारीख से की जाती है, जिस दिन रक्तस्त्राव शुरू हुआ न की वो तारीख जब ये खत्म हुआ , महीनों की गिनती में अधिकांश महिलाएं ये गलती कर जाती हैं )। गर्भावस्था की पहली तिमाही गर्भावस्था के अंतिम मासिक धर्म से बारहवें सप्ताह की समाप्ति तक परिभाषित की जाती है। यह सबसे अच्छा समय है जब गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में अधिकतम जानकारी मिलती है। यह क्यों महत्वपूर्ण है ? क्योंकि गर्भावस्था के पहले 12 हफ़्ते बड़ी ही संवेदनशील समयावधि है, इस समय गर्भ में पल रहे भ्रुण की मानव शरीर में रूपांतरण की प्रक्रिया बड़ी ही तेज़ी से क्रियांवयित होती है । इसे ऑर्गेनोजेनेसिस या हिंदी में कहें अंगनिर्माण की महत्वपूर्ण अवधि के रूप में जाना जाता है, अगर पूरी गर्भावस्था की समयावधि को देंखे तो इसी दौरान जटिलताओं या असामान्यताओं की संभावनाएं भी सबसे ज्यादा होती हैं, और इन्ही प्रारंभिक जटिलताओं का पता लगाने के लिए सोनोग्राफी, प्रारंभिक गर्भावस्था के मूल्यांकन की एक बहुत ही संवेदनशील विधि है।

प्रश्न 2) गर्भावस्था के शुरुआत में ही सोनोग्राफी की जांच कराना इतना महत्वपूर्ण क्यों है , क्या होगा अगर में ये जांच कराऊ तो ?

इस वक्त मैं आपको जो भी बताने जा रहीं हूँ, कृपया इसे धैर्यपूर्वक सुनें । ये सारी बातें जानना और समझना  महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि यह निश्चित रूप से आपकी गर्भावस्था की उचित देखभाल में मदद करेंगी।

जैसे ही आप गर्भस्थ होती हैं, क्या ये जान पाना सम्भव है ,कि गर्भाशय के भीतर असल में हो क्या रहा है, पल रहा गर्भ वास्तव में किन जरूरी या गैरज़रूरी प्रक्रियाओं से गुज़र रहा है ? सिर्फ सोनोग्राफी ही वो माध्यम है, जो ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है । इससे पहले की देर हो जाये, यह जांच जल्द से जल्द करवाना चाहिए, जिससे इस बारे में एक मोटा अंदाजा लगाया जा सकता है, कि गर्भावस्था की प्रक्रिया सुचारू है या नहीं । गर्भावस्था की प्रारंभिक जाँच इस बात की पुष्टि करती है, कि भ्रूण में धड़कन पैदा हुई है या नहीं और ये भी की गर्भ का विकास सामान्य है या असामान्य ।

इस अवधि के दौरान अल्ट्रासाउंड मुख्यतः जिन बातों को प्रकाशित करता है वे हैं:

1) अंतर्गर्भाशयी गर्भावस्था की पुष्टि (Intra uterine pregnancy/ IUP) :-

प्रारंभिक जानकारियां ये जान पाने में सहायक होती हैं , कि यह एक स्वस्थ अंतर्गर्भाशयी गर्भावस्था है या नहीं, उदाहरण के लिए, यदि डेसिदुआल रिएक्शन (desidual reaction) अच्छी है, तो यह मोटे तौर पर स्वस्थ कहि जाती है (अब यहाँ जानकारी के लिए बता दूँ, डेसिदुआल प्रतिक्रिया या रिएक्शन,  गर्भाशय में निहित केंद्रीय झिल्ली जिसे एंडोमेट्रियम कहते हैं, जो कि गर्भावस्था के पहले अपने मूल रूप में होती है, में बढ़ते हुए भ्रूण को उचित पोषण और रक्त की आपूर्ति देने के इरादे से आकार और मोटाई में गर्भावस्था के दौरान बहुत सारे सूक्ष्म संरचनात्मक परिवर्तनों से गुजरती है, जैसे ही भ्रूण गर्भाशय की इस केंद्रीय झिल्ली में प्रत्यारोपित होता है, यह शुरुआत से ही एक छोटी पानीदार थैली जिसे गेस्टेशनल सैक कहते हैं, के अंदर सुरक्षित बढ़ने लगता है, तो यह डेसिदूसल रिएक्शन बढ़ते हुए भ्रूण के आसपास की जो छोटी थैली होती है, उसे चारों तरफ से घेरे रहती है,  जो कि सोनोग्राफी जाँच में दो चमकदार मोटी परतों के रूप में दिखाई देती है) यदि परत एक हो तो ज्यादा संभावना है, कि गर्भावस्था अस्वस्थ है,  या गर्भ की थैली के आसपास इसी डेसिदुआल परत में रक्तस्राव जिसे सबकोरियोनिक ब्लीड कहतें हैं, हो तो सोनोग्राफी में यह एक जैसी चिकनी न दिखकर विकृत दिखाई देती है, शुरुआत से ऐसी गर्भधारण की बहुत देखभाल करने की आवश्यकता होती है, और यदि गर्भावस्था में शुरुआत में ही सोनोग्राफी न की जये तो ऐसी विषमताओं का पता नहीं लग पाता जबकि असल में इनका इलाज बड़ा ही सरल होता है, थोड़ी बहुत दवाओं और उचित देख रेख के साथ हम न केवल तात्कालिक गर्भावस्था की एक बेहतर और स्वस्थ बढ़त के लिए प्रयास कर पाने में समर्थ होते हैं, बल्कि कई बार इस छोटी सी प्रारंभिक जांच से अप्रत्याशित गर्भपात से भी बचा जा सकता है।

2) गर्भावस्था की डेटिंग :-
पहला त्रैमासिक अल्ट्रासाउंड तब जरूरी हो जाता है, जब अंतिम मासिक धर्म की तारीख अनिश्चित होती है, या आपको याद नहीं होती है, जैसे कि महीनों का निश्चित समयांतराल में न आना या फिर लम्बी अवधि तक मासिक धर्म नहीं आना उदह्रन के लिये ये उस परिस्थिति में होता है, जब आपका पहला शिशु अभी भी स्तनपान कर रहा हो या जब दो चक्रों के बीच अंतराल 15 से 25 दिनों से भी कम का है उस,या यह 35 से 45 दिनों से अधिक लंबा है, कभी कभी तो ये दो या तीन महीने से भी अधिक लंबा हो जाता है। सोनोग्राफी करते समय हम डॉक्टर अक्सर इन स्थितियोँ का सामना करते हैं, इसलिए ऐसी परिस्थितियों में ये पता लगा पाना की गर्भावस्था प्रक्रिया कौन से चरण पर है केवल शुरुआती गर्भावस्था अल्ट्रासाउंड स्कैन के माध्यम से ही संभव हो पाता है, जो कि आसानी से उपलब्ध भी है, और केवल तभी आपके डॉक्टर गर्भावस्था के आगे के नियोजन के लिए रूपरेखा बना पाने में समर्थ होते हैं । गर्भावस्था की सटीक समयावधि या कहें कि कितने महीने निकल चुके हैं, ये सबसे पहले होने वाली सोनोग्राफी से ही जाना जाता है।

3) भ्रूण में घड़कन है या नहीं :-
शुरुआत में भ्रूण का विकास सही दिशा में हो रहा है या नहीं इसकी पुष्टि तभी संभव है, जब विकसित हो रहा भ्रूण अपने सही स्थान पर प्रत्यारोपित हो यानि गर्भाशय के केंद्र में और साथ ही यह भी की एक निश्चित समयांतराल बाद उसमें धड़कन विकसित हुई है या नहीं, यदि मासिक धर्म नियमत हैं, तो मोटे तौर पर धड़कन सामान्यतः गर्भ धारण करने के 6 से 7 सप्ताह में विकसित हो जाती है । और ये जानकारी मात्र प्रारंभिक सोनोग्राफी के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है और कोई तरीका नहीं है।

4) भ्रूण के प्रारंभिक विकास का मूल्यांकन कहीं ये असामान्य तो नहीं :-
यह जान पाना अत्यंत आवश्यक है, कि भ्रूण का प्रारंभिक विकास सामान्य है या नहीं यह अनुमान लगाने के लिए कि क्या हम इस गर्भावस्था को जारी रख पाने की स्थिति में हैं भी ? इसके अलावा गर्भावस्था की शुरआत में ही यह जानना महत्वपूर्ण है, कि गर्भ में पल रहे भ्रूण की संख्या कहीं एक से अधिक तो नहीं , ताकि इनका उचित देखभाल और प्रबंधन शुरुआत से ही अच्छा हो ।

5) इस बात का पता लगा पाना की पल रहा भ्रूण अपने यथोचित स्थान पे है या नहीं :-
अंडाणु और शुक्राणु के संयुग्मन के ठीक उपरांत बना हुआ भ्रूण सबसे पहले प्रत्यारोपण / इम्प्लांटशन के लिए सही स्थान की तलाश करता है, कि यह गर्भ में एक ऐसे स्थान पर स्थापित हो सके जहां से आगे की वृद्धि के लिए पोषक तत्वों और रक्त की आपूर्ति पर्याप्त हो। सामान्यतः यह प्रत्यारोपण गर्भाशय के मध्य भाग में होता है जिसे चिकित्सकीय भाषा में फंडस कहते हैं। यह आरोपण संयुग्मन/ फर्टिलाइजेशन के बाद 6 से 12 दिनों के भीतर हो जाता है, यदि हम मासिक धर्म के दृष्टिकोण से देंखे और मोटे तौर पर इन्हें 30 दिन का चक्र अगर मान कर चलें तो रक्तस्त्राव के पहले दिन से लगभग 25वें दिन में भ्रूण का प्रत्यारोपण होता है, अब ये जानकारी महत्वपूर्ण इसलिए है कि अगर संयुग्मन हुआ है और आप ने गर्भ धारण किया है, तो प्रत्यारोप जैसी महत्वपूर्ण घटना आपका महीना पूरा होने से पहले ही हो चुकी होती है। यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है? यदि असामान्य स्थान पर आरोपण होता है तो क्या होगा ? प्रत्यारोपण के लिहाज़ से फंडस के अतिरिक्त कोई भी स्थान असामान्य कहा जाता है, जिसे एक्टोपिक प्रेगनेंसी कहते हैं, जैसे कि यह गर्भ के निचले हिस्से में हो सकता है जिसे लोअर यूटेराइन सेगमेंट कहतें हैं, या गर्भाशय के कोने में जिसे करनुआ कहते हैं या फिर गर्भाशय और आपके अंडाशय को जोड़ने वाली नली जिसे की फ़ेलोपीएन ट्यूब कहते हैं, यहां तक कि उस भाग में जो गर्भाशय और उसकी फ़ेलोपीएन ट्यूब के आस पास होता है मेडिकल शब्दावली में जिसे एडनेक्सा कहा जाता है और कभी कभी यह एक्टोपिक प्रेग्नेंसी गर्भाशय के निचले हिस्से में भी ठहर जाती है जहाँ पिछले सिजेरियन डिलीवरी के टांको के निशान होते हैं। अब यह केवल प्रारंभिक गर्भावस्था का अल्ट्रासाउंड स्कैन है, जो यह पता लगा सकता है कि भ्रूण का प्रत्यारोपण असल में हुआ कहा हैं ? गर्भावस्था कहीं एक्टोपिक तो नहीं ? इसका पता लगा पाना जितनी जल्दी हो सके उतना आवश्यक होता है, क्योंकि गर्भ ठहराव की ऐसी असामान्य स्थिति खतरनाक होती है, और इस तरह के गर्भधारण को वृद्धि के लिए छोड़ देना तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि ऐसे असामान्य रूप से स्थित अंडे को एक स्वस्थ गर्भ में विकसित हो पाने का मौका नहीं मिलता है, रक्त की आपूर्ति इन भागों में गर्भाशय के केंद्र की तुलना में कम ही होती है, और जब ये असामान्य रूप से स्थित गर्भ विकसित होने लगता है तो उसके आकार में वृद्धि के कारण गर्भाशय के इन संकरे भागों के फटने की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि ये स्थान प्रत्यारोपण के लिए होते ही नहीं है, इसलिये गर्भाशय के केंद्र की तुलना में इनमें पर्याप्त फैलाव की संभावना नहीं होती । एक्टोपिक प्रेगनेंसी होने की स्थिति में समय पर जाँच करके इसकी पुष्टि न हो पाने से अगर यह फटते हैं, तो यह आस-पास के अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, और इससे कुछ मामलों में आंतरिक रक्तस्त्राव इतना अधिक हो जाता है कि यदि समय पर इलाज़ न मिल पाया तो गर्भस्थ महिला के जीवन को भी खतरा हो जाता है, और ठीक इसके विपरीत यदि समय पर एक्टोपिक होने की स्थिति का पता लग जाये तो आपके डॉक्टर आपको अनावश्यक ऑपरेशन या सर्जरी से भी बचा सकते हैं, क्योंकि समय पर जाँच से ऐसी गर्भावस्था को दवा और इंजेक्शन के माध्यम से सुखा कर समाप्त किया जा सकता है और धीरे धीरे दवा के प्रभाव में ऐसे गर्भ सिकुड़ कर लगभग गायब ही हो जाते हैं, जैसे कि वहाँ कभी कुछ था ही नहीं और गर्भाशय का वो हिस्सा सुरक्षित भी रहता है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण असामान्य प्रत्यारोपण के परिणाम स्वरूप गर्भाशय के प्रभावित हिस्से के फटने जैसी दुर्घटनाओं का सामना हम डॉक्टर्स को ज्यादा करना पड़ता है, क्योंकि जन सामान्य इतना जागरूक नहीं है ,कि समयानुसार गर्भ ठहरने के या मासिक धर्म चूक जाने के साथ ही डॉक्टर्स से इस बारे में परामर्श लिया जाए । एक्टोपिक प्रेग्नेंसी के चलते गर्भाशय के प्रभावित हिस्से के फटने जैसी दुर्घटनाओं का एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू ये भी है, कि अगर ट्यूबल भाग में आरोपण हुआ हो और ये फट गई है तो यह आगे चलकर प्रजनन क्षमता की संभावना को आधा कर देता है क्योंकि तब दो में से केवल एक ही ट्यूब गर्भाशय में उसी तरफ के अंडाशय को जोड़ने के लिए उपलब्ध हो पाएगी, जिसे समय रहते सोनोग्राफी कर पता लगाकर पूरी तरह से रोका जा सकता था। ये सारी जानकारी दे कर आपको घबराना या असमंजस्य में डालना मेरा उद्देश्य बिल्कुल नहीं है, सौभाग्य से हमारे शरीर की रचना और इसकी कार्यप्रणाली इतनी सुनियोजित और कार्यकौशल इतना सटीक है, कि एक्टोपिक प्रेग्नेंसी की संभावनायें बहुत कम लगभग न के बराबर होती हैं, लेकिन फिर भी एक संभावना तो होती ही है, और बतौर रेडियोलॉजिस्ट हम कई बार इस तरह की स्थितियों का सामना करते हैं, तब जबकि इनका इलाज़ पूरी तरह से संभव है सिर्फ इसलिये क्योंकि महिला या उसका परिवार गर्भावस्था के शुरुआत में ही सोनोग्राफी कराए जाने को महत्व नहीं देता।

6) यदि आपको गर्भावस्था के दौरान रक्तस्राव / स्पॉटिंग की शिकायत है:-
यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है, कि गर्भावस्था के दौरान गर्भाशय के अंदर वास्तव में क्या कुछ घटित हो रहा है, ताकि आपके डॉक्टर आगे के उपचार की सटीक रूपरेखा तय कर सकें । कभी-कभी जटिलताओं के अतिरिक्त बिल्कुल स्वस्थरूप से समझ आ रही गर्भावस्था में भी रक्तस्राव संभव होता है, जैसे कि,
1* थ्रेटेंडे मिसकेरेज, जिसमें की गर्भ के आस पास या कहें देसिडुअल रिएक्शन में असामान्य आंतरिक रक्तस्त्राव के कारण गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है ।
2* इनएविटेबल एबॉर्शन, अब ये ऐसी स्थिति है जब अंदर ही अंदर गर्भपात हो चुका होता है, और गर्भाशय का निचला हिस्सा फैल कर गर्भपात के निर्जीव उत्पादों को अपने अंदर ही पड़े रहने देता है, और इसमें ये भी संभव है कि बहुत दिनों तक ये उत्पाद ऐसे ही पड़े रहें या नाम मात्र रक्तस्त्राव हो और गर्भस्थ महिला इसे बहुत दिनों तक एक सामान्य गर्भावस्था ही मन कर चले ।
3* अपूर्ण गर्भपात ( इन्कम्प्लीट मिसकेरिएज) जिसका मतलब है की जब अंदर ही अंदर गर्भपात हो जाता है और इसका ज्यादातर हिस्सा रक्तस्त्राव में निकल चुका होता है, लेकिन कुछ हिस्सा अभी भी गर्भाशय में पड़ा हुआ होता है । बहुत से मामलों में तो महिला को समझ ही नहीं आता कि वो कभी को गर्भस्थ थी भी, और ऐसी स्थितियों को मासिक धर्म के असामान्य रक्तस्त्राव के रूप में ही लेकर चलतीं हैं, वो तो डॉक्टर से सलाह लेने और सोनोग्राफी की जाँच के बाद समझ पड़ता है, की असल में हुआ क्या था ।
4*पूर्ण गर्भपात : अब इसका मतलब है, कि गर्भपात के बाद बचे हुए उत्पाद जब पूरी तरह से निकल चुके होते हैं, फिर भी थोड़ा बहुत रक्तस्त्राव कुछ दिनों के अंतराल में दिखाई दे सकता है।
इन सभी उदाहरणों से देखा जा सकता है, कि प्रारंभिक अवधि के विकास के दौरान हल्का सा भी समझ आने वाला रक्तस्त्राव असल में कितनी अलग अलग परिस्थितियों के साथ प्रस्तुत हो सकता है, यह एक पूर्ण रूप से स्वस्थ प्रेग्नेंसी भी हो सकती है, या फिर संपूर्ण गर्भपात की स्थिति भी, और इसका पता मात्र प्रारंभिक अवस्था में की जाने वाली सोनोग्राफी जांच के माध्यम से ही लगाया जा सकता है ।

7) असामान्य गर्भ :
कभी-कभी पीरियड्स मिस होने के बाद भी यह संभव है, कि जो भी अंदर विकसित हो रहा है वह पूर्णतः सामान्य ही न है, जैसा की ट्रोफोब्लास्टिक /मोलर प्रग्नेंसी में होता है, समझने के लिए बता दूं कि ट्रोफोब्लास्ट कोशिकाओं की परतें होती हैं जो सामान्य रूप से भ्रूण को चारों ओर से घेरे हुए होती हैं, और समय के साथ ये प्लेसेंटा या कहें आँवल या अपरा के रूप में विकसित होती हैं, जो विकासशील भ्रूण को पोषण देती है,( ट्रोफो – का शाब्दिक अर्थ है पोषण, और -ब्लास्ट का अर्थ है कली या प्रारंभिक विकसित हो रही कोशिकायें )। कभी-कभी असामान्य निषेचन (फर्टिलाइजेशन ) के परिणामस्वरूप होता क्या है, कि ये कोशिकाएं असामान्य रूप से और अत्यधिक तीव्रता से बढ़ती चली जाती हैं, और जल्द ही एक ट्यूमर या गाँठ का रूप ले लेती हैं, बजाये की वो एक पूर्णतः स्वस्थ गर्भावस्था में विकसित होती । ये भी विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं जैसे 1. कंपलीट मोल : जिसमें सिर्फ ट्रोफोब्लास्टिक टिश्यू/ उत्तक या कहें कोशिकायें होती हैं , 2. पार्शियल मोल : जिसमें कुछ हिस्सा ट्रोफोब्लास्टिक कोशिकाओं का होता है, और कुछ हिस्से में भ्रूण के विभिन्न अंग बने हुई होते हैं जैसे हाथ या पैर ज्यादार दांत बाल नाखून जैसी कोशिकायें मिलती हैं लेकिन ये निर्जीव होता है, 3. पूरी तरह से बने और विकसित हो रहे जीवित भ्रूण के साथ अपरा/ प्लेसेंटा के कुछ हिस्से में मोलर टिश्यू का कुछ भाग, 4. इन्वेसिव मोल : ऐसी मोलर प्रेग्नेंसी जो कि गर्भाशय के फंडल हिस्से तक सीमित न होके उसकी मांशपेशीय दीवार को भी पार कर आसपास के हिस्से में केंसर के रूप में प्रवेश करने लगती है ।
तो ये ऐसी तमाम परिस्थितियां हैं, जिनमें आपको लग सकते हैं, कि अंदर सबकुछ ठीक है, क्योंकि ये असामान्य रूप से विकसित हो रही परिस्थितियां कई बार कोई संकेत ही नहीं देती। सोचने वाली बात ये है, कि गर्भ के अंदर कुछ असामान्य विकसित हो रहा है ,जो कि नियमित रूप से आपके शरीर का पोषक और अत्यधिक मात्रा में उस रक्त का उपभोग कर रहा है, जो की एक स्वस्थ रूप के विकसित हो रहे बच्चे के लिए होना चाहिए था, परिणाम स्वरूप आपको अनावश्यक रूप से कमजोर बनाता चला जा रहा है और आगे की स्थिति को और भी जटिल बना पाने में समर्थ है, और ये सब सिर्फ इसलिए क्योंकि आप और आपके परिजन जल्द ही डॉक्टर से प्रारंभिक परामर्श लेने से चूक गए और प्रारंभिक गर्भावस्था की अल्ट्रासाउंड जांच कराने को उतना महत्व नहीं दिया क्योंकि आप इसके प्रति जागरूक नहीं हैं। हालांकि इस तरह की असामान्य परिस्थितियों का आसानी से इलाज संभव है, लेकिन इसमें थोड़ा समय भी लग सकता है, परंतु इसके लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है, कि जल्द से जल्द इसकी जाँच हो सके । अब यहाँ भी ज्यादा चिंता करने की या घबराने वाली बात नहीं है, क्योंकि इन असामान्य परिस्थितियों की संभावना न के बराबर ही होती है, लेकिन इसका अंदाज़ा लगा पाना असंभव है, कि कौन इससे प्रभावित होगा और कौन नहीं । सौभाग्य से ज्यादातर ये ट्रोफोब्लास्टिक ट्यूमर मामूली गाँठे ही होते हैं, इनके कैंसर में परिवर्तित होने की संभावना न के बराबर होती है, लेकिन इस प्रकार की कुछ विरली गाँठे केंसर (इन्वेसिव मोल) का रूप भी ले सकतीं हैं।

अब हम एक अन्य असामान्य स्थिति की बात करते हैं, जिसे एनएमब्रीयोनिक गर्भधारण कहा जाता है, जिसमें की भ्रूण धारण करने वाली थैली जिसे गेस्टेशनल सैक कहते हैं तो बनती है, लेकिन लंबे समय के अंतराल के बाद भी इसमें भ्रूण विकसित ही नहीं होता है। अल्ट्रासाउंड स्कैन में गेस्टेशनल सैक अंतिम मासिक चक्र के 4 से 5 सप्ताह के बाद गर्भवस्था की पुष्टि के लिए सबसे पहले दिखाई देने वाली संरचना होती है , फिर धीरे-धीरे एक सप्ताह के भीतर इसमें भ्रूण विकसित हो जाता है। एनेम्ब्रीयोनिक गर्भधारण भी असामान्य निषेचन के परिणामस्वरूप होता है, और इस तरह के गर्भधारण में चूंकि विकास की कोई भी सम्भावना नहीं होती इसलिए भ्रुण के विकसित होने का इंतज़ार करने में कोई समझदारी नहीं होती और इन स्थितियों का पता केवल प्रारंभिक गर्भावस्था अल्ट्रासाउंड स्कैन के माध्यम से किया जा सकता है।
फीटल/ एम्ब्रियोनिक डिमाइस या कहें मिस्ड अबोर्शन यह एक अन्य स्थिति है, जहां गेस्टेशनल सैक तो विकसित होता है और इसमें भ्रूण भी विकसित होता है लेकिन दुर्भाग्यवश कुछ कारणों से जल्द ही इसकी धड़कन ख़त्म हो जाती है या फिर विकसित ही नहीं हो पाती है। इसे मिस्ड अबोर्शन या गर्भपात इसलिए कहते हैं, क्योंकि इसमें पता ही नहीं चलता की अंदर ही अंदर गर्भ कब समाप्त हो गया है इस प्रकार के गर्भपात के लक्षण नहीं होते हैं, लेकिन कभी-कभी रक्तस्राव और पेट में ऐंठन हो सकते हैं । ये जानकारी केवल प्रारंभिक गर्भावस्था की सोनोग्राफी के माध्यम से ही पता लगाई जा सकती है, और यह महत्वपूर्ण इसलिए भी है, क्योंकि लगभग 80 प्रतिशत गर्भपात पहली तिमाही में ही होते हैं, और इनके कारणों का पूरी तरह से पता नहीं चलता है। इसमें से लगभग 50 प्रतिशत गर्भपात इसलिए होते हैं क्योंकि भ्रूण में गुणसूत्रों की संख्या गलत होती है, या कभी-कभी गर्भाशय की समस्याओं के कारण ऐसा होता है, जैसे कि गर्भाशय में कोई घाव का निशान या स्कार, किसी प्रकार का अंतःस्रावी (एंडो क्राइनल) या स्व-प्रतिरक्षित (ऑटो- इम्यून) विकार या फिर शारीरिक आघात एक मिस्ड अबोर्शन का कारण बन सकता है।

8) नाल, गर्भाशय, अंडाशय, एडनेक्सा और गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) की जांच :-
एक बच्चे के विकास के बारे में जानकारी के अलावा अन्य महत्वपूर्ण चीजें जो गर्भावस्था के शुरुआती स्कैन में पता होनी चाहिए वो हैं, कि आपके गर्भाशय का आकार संरचना असामान्य या विकृत तो नहीं, अंडाशय में कोई खराबी, विकृति या किसी भी प्रकार की गाँठ विकसित तो नहीं हो रही, कोई एडनेक्सल पैथोलॉजी या बीमारी तो नहीं ( एडिनेक्सा गर्भाशय और अंडाशय को आस पास से घेर कर सहारा देने वाली संरचना को कहते हैं ) । गर्भाशय शुरुआत में आकार में थोड़ा छोटा होता है, इसलिए इस समय गर्भाशय से संबंधित संरचनात्मक असामान्यताओं का पता लगाना आसान होता है, और संरचना संबंधी ये जानकारियां शुरुआत में ही पता हों तो गर्भ की देखरेख के लिए डॉक्टर्स को आवश्यक निर्णय लेने में समय रहते मदद मिल जाती है । लेकिन अगर आप गर्भावस्था के बाद की अवधि में पहली बार अल्ट्रासाउंड स्कैन के लिए जाती हैं, तब जबकि गर्भाशय पहले से ही आकार में बहुत अधिक बढ़ गया है, तो कभी-कभी ये संरचनात्मक असामान्यताएं दिखाई नहीं पड़ती क्योंकि विकसित हो रहा गर्भ आकार में अपेक्षाकृत बड़ा होने के कारण गर्भाशय की संरचना को पीछे छिपा लेता है, इसलिए भी गर्भावस्था की पहली तिमाही में सोनोग्राफी कराना इतना महत्वपूर्ण है ।
एक और महत्वपूर्ण जानकारी जो हम पहली सोनोग्राफी से प्राप्त कर सकते हैं, वो है गर्भाशय के बाहरी रास्ते की लंबाई (सर्वाइकल लैंग्थ ) या जिसे आम बोलचाल में बच्चादानी का मुह कहते हैं, जिसका एक पर्याप्त लंबाई में होना आवश्यक है, सामान्यतः 30 मिलीमीटर की लंबाई पर्याप्त मानी जाती है ,लेकिन इससे कम होने की दशा में कभी भी गर्भपात का खतरा बना रहता है, जिसकी जानकारी उचित समय पर उब्लब्ध होने से उपचार और दवाओं के माध्यम से टाला जा सकता है ।

9) नकल स्कैन या नकल ट्रांसलूसेंसी एवं नेसल बोन (NTNB) स्कैन :-
पहली त्रिमसी का अल्ट्रासाउंड विकसित हो रहे भ्रुण की संरचना का शुरुआत में ही विस्तृत अध्ययन के लिए भी किया जाता है, खास कर तब जब कोई संरचनात्मक या जन्मजात विकृति होने की संभावना अधिक होती है , जिसे नकल स्कैन या नकल ट्रांसलूसेंसी स्कैन भी कहते हैं ।
नकल ट्रांसलूसेंसी स्कैन एक भ्रूण में गुणसूत्र संबंधी असामान्यताओं का पता लगाने के लिए एक सोनोग्राफिक प्रीनेटल स्क्रीनिंग स्कैन है, नकल ट्रांसलूसेंसी एक भ्रूण की गर्दन के पीछे की त्वचा में सामान्य रूप से उपस्थित द्रव का नाम है। अल्ट्रासाउंड स्कैन में देखने पर अगर ये द्रव बहुत अधिक मात्रा में हो तो इसे असामान्य माना जाता है, मापने पर सामान्यतः इसकी मोटाई 3 मिलीमीटर से कम आनी चाहिए अधिक मात्रा में पाए जाने पर ये 3 मिलीमीटर से अधिक की मोटाई दर्शाता है । ध्यान देने योग्य बात है, कि यह स्कैन कुछ जन्मजात असामान्यताओं की संभावनाओं का पता लगा पाने में सक्षम होता है, सम्मिलित रूप में जिन्हें सिंड्रोम ( आनुवांशिकी दोष) कहते हैं, जो कि कुछ गुणसूत्रीय (क्रोमोसोमल) विकारों के परिणाम स्वरूप होती हैं, जैसे डाउन सिंड्रोम, पटाऊ सिंड्रोम, एडवर्ड्स सिंड्रोम, और इसके अलावा गैर-आनुवंशिक शरीर की असामान्यताएं जैसे कि न्यूरल ट्यूब दोष अर्थात रीढ़ की हड्डी और कशेरुक स्तंभ (स्पाइनल कॉर्ड) से संबंधित विकृति और कुछ एक मस्तिष्क के विकास से संबंधित विकृति, पेट की मांसपेशियों और त्वचा का पूर्ण रूप से विकसित न हो पाना, हाथ और पैर की भुजाओं में असामान्यताएं और कुछ जन्मजात हृदय रोगों कि सम्भावना का भी पता लगाया जा सकता है। ये सभी अलग अलग विकृतियां जरूर हैं , लेकिन इन सभी परिस्थितियों में एक जैसा परिणाम गर्दन के पीछे की त्वचा के भीतर द्रव संचय में वृद्धि हो जाना या कहें नकल ट्रांसलूसेंसी का बढ़ना पाया जाता है, और इसी आधार पर सोनोग्राफी के माध्यम से यह अंदाजा लगाया जा सकता है, कि विकास में कुछ गड़बड़ी है। नकल ट्रांसलूसेंसी के अलावा, एक और महत्वपूर्ण बात इस स्कैन में सम्मिलित होती है वो है, नाक की हड्डी देखना जिसे नेसल बोन (NB) कहते हैं । अल्ट्रासाउंड द्वारा नाक की हड्डी को मापना महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ क्रोमोसोमल (गुणसूत्रीय) असामान्यताओं में नाक की हड्डी या तो नहीं बनती या बड़ी छोटी होती है, इसलिए अल्ट्रासाउंड स्कैन करते समय असामान्यता के लिए इसे भी एक संकेत के रूप में माना जाता है।
सामान्यतः यह NTNB स्कैन गर्भावस्था के 11 हफ़्ते 3 दिन और 13 हफ़्ते 6 दिन के बीच ही किया जाता है क्योंकि इस अवधि में यह जांच सबसे सटीक परिणाम देती है।
यह स्कैन जैसा कि नाम से परिभाषित है NTNB जरूर है, लेकिन ये सिर्फ नाक की हड्डी देखने या नकल ट्रांसलूसेंसी मापने तक सीमित नहीं होता इसमें विकसित हो रहे भ्रूण की शारीरिक संरचना के बारे में विस्तार से जानकारी ली जाती है, कि कहीं कोई संरचनात्मक समस्या तो नहीं । इस अवस्था में भ्रूण की लंबाई जिसे क्राउन रम्प लेंथ कहतें हैं, लगभग 45 से 85 मिलीमीटर की होती है, जिसमें इस अवस्था के अनुरूप ये देखा जाता है, कि शरीर के विभिन्न आंतरिक अंग जैसे दिमाग, रीढ़ की हड्डी एवं मेरुदंड (स्पाइनल कॉर्ड), भ्रूण के चेहरे की संरचना, छाती और उसके अंदर फेफड़े एवं हृदय और उसके प्रकोष्ठ की जानकारी, पेट के अंग, पेट एवं छाती की दीवार कहीं इसमें कोई विकृति तो नहीं चारों भुजाओं, हाथ एवं पैर का सही अनुपात में विकास इत्यादि भी देखा जाता है ।
समझने वाली बात ये है, कि बढ़ी हुई नकल ट्रांसलूसेंसी गुणसूत्रीय असामान्यता या एक सिंड्रोम का संकेत कर सकती है, जैसा कि उल्लेख किया गया है, लेकिन यह आपको नहीं बताता है कि आपके बच्चे को निश्चित रूप से कोई असामान्यता है भी या नहीं। इसके परिणाम आपको ये बता पाने में समर्थ हैं, कि आपके बच्चे में सामान्य आबादी की तुलना में क्रोमोसोमल असामान्यता होने की संभावना है कि नहीं।
आपको इसी अवधि में इस जांच से संबंधित रक्त परीक्षण कराने को भी कहा जा सकता है, जिसे डुअल मार्कर परीक्षण कहते हैं। आपके डॉक्टर गर्भस्थ शिशु में क्रोमोसोमल असामान्यता की संभावना की और अधिक सटीक तस्वीर प्राप्त करने के लिए इन दोनों जांचों के संयुक्त परीक्षण (रक्त परीक्षण और न्यूकल ट्रांसलेंसी स्कैन) के परिणामों को देखते हैं ।
गुणसूत्र असामान्यता के जोखिम की गणना करने के लिए अकेले नकल ट्रांसलुसेंसी स्कैन के परिणामों का उपयोग नहीं किया जाता, खून की जांच के परिणामों के साथ ये गणना मां की उम्र, आपके भ्रूण की नकल ट्रांसलूसेन्सी की मोटाई, नाक की हड्डी की लंबाई, भ्रूण के शरीर की लंबाई जिसे क्राउन रम्प लेंथ कहते हैं, इन सभी के आधार पर की जाता है । यदि आपके जोख़िम की संभावना 250 में 1 या उससे अधिक (150 में 1) आती है, तो आपको “बढ़ी हुई जोखिम” या “हाई रिस्क” श्रेणी में माना जाता है।
अगर आपको उच्च जोखिम के रूप में वर्गीकृत किया भी गया है, तो यह भी संभव है, कि आपके बच्चे को शायद एक क्रोमोसोमल असामान्यता न भी हो। इन परिस्थितियों में आपको एक आनुवंशिक परामर्शदाता के पास परामर्श के लिये भी भेजा जा सकता है। वे आपके विकल्पों पर चर्चा करेंगे और आपको यह तय करने में मदद करेंगे,कि क्या आपको कोरियोनिक विलस सैंपलिंग (सीवीएस) या एमनियोसेंटेसिस जैसे परीक्षण की आवश्यकता है या नहीं, जिसमें गर्भाशय के अंदर से कुछ नमूने या सैम्पल गर्भावस्था को नुकसान पहुंचाए बिना लिए जाते हैं । ये परीक्षण आपको निश्चित रूप से बता पाने में समर्थ हैं, कि आपके बच्चे में क्रोमोसोमल असामान्यता है या नहीं।
नकल ट्रांसलूसेंसी स्क्रीनिंग एक असामान्यता के जोखिम की संभावना निर्धारित कर सकती है, तो इसका मतलब यह नहीं है, कि कोई असामान्यता मौजूद ही हो परंतु ये इस बात का संकेत देती है कि सम्पूर्ण जानकारी के लिए आगे के परीक्षण की आवश्यकता है।

10) प्रीक्लेम्पसिया (गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप) और फीटल ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन (गर्भस्थ शिशु का आकार या वज़न कम होना) की संभावना का आकलन करने के लिए :-
अल्ट्रासाउंड स्कैन की मदद से वर्तमान गर्भावस्था में यह आकलन करना संभव है, कि क्या गर्भस्थ महिला को प्रीक्लेम्पसिया होने की कोई संभावना है या नहीं, पहले से सामान्य रक्तचाप या ब्लड प्रेशर वाली महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान 20 हफ़्ते या उसके बाद में उच्च रक्तचाप की शिकायत होने की स्थिति को प्रीक्लेम्पसिया कहा जाता है । गर्भावस्था के शुरुआत में ही इस बात का पता लगाया जा सकता है, कि इस प्रेग्नेंसी में आप को प्रीक्लेम्पसिया होने की संभावना है या नहीं और गर्भ में पल रहे भ्रूण में ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन की संभावना है या नहीं । यह संभव हो पाता है, पहली तिमाही (11 से 13 सप्ताह के बीच) के स्कैन में अल्ट्रासाउंड मशीन की मदद से गर्भाशय धमनियों ( यूटेराइन आर्टरी) के रक्त प्रवाह की गणना यूटेराइन डॉप्प्लर के माध्यम से करने से, (यूटेराइन आर्टरी वे रक्तवाहिकाएं है, जो भ्रूण के पोषण के लिए गर्भ में रक्त प्रदान करती हैं), इसके अतिरिक्त डॉक्टर आपसे कुछ प्रासंगिक प्रश्न पूछते हैं जैसे कि ,
1) क्या आपकी अपनी मां को उनकी किसी भी गर्भावस्था में प्रीप्लेम्पसिया या उच्च रक्तचाप की समस्या थी (यह जान पाना इसलिये महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर आपकी माता को प्रीक्लेम्पसिया की समस्या थी तो आपकी किसी भी प्रेग्नेंसी में इसके होने की संभावना बढ़ जाती है ),
2) आप धूम्रपान करतीं हैं या नहीं, क्योंकि धूम्रपान का उच्च रक्तचाप होने के साथ मजबूत संबंध है .
3) आप पहले से ही उच्च रक्तचाप से पीड़ित तो नहीं, आपको मधुमेह, SLE और APLS तो नहीं (SLE एवं APLS बीमारियों में खून में थक्का जमने की सूक्ष्म प्रणाली अनियमितता हो जाती है, जिससे कि रक्त वाहिकाओं में जहाँ तहाँ थक्का जम जाता है और बार बार गर्भपात जैसी समस्या भी आती है), क्योंकि ये कुछ विशेष बीमारियां गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप होने की संभावना को बढ़ा देती हैं।
4) डॉक्टर आपसे ये भी पूछेंगे कि क्या गर्भ अपने आप ही ठहर गया या इसके लिए कोई विशेष उपचार कराने की आवश्यकता पड़ी जैसे की ओवुलेशन इंडक्शन ( जिसमें हार्मोनल/ अन्तःस्त्रावी इंजेक्शन के माध्यम से महिला के अंडाशय में अंडाणु या ओवम बनने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाता है) या इनविट्रो फर्टिलाइजेशन (यह निषेचन की एक कृत्रिम प्रक्रिया है, जिसमें महिला के अंडाशय से अंडे निकालकर उसका संपर्क एक विशेष पात्र में पुरुष के शुक्राणुओं से कराया जाता है। इसके बाद निषेचित अंडे को महिला के गर्भाशय में कुछ उपकरणों के माध्यम से प्रत्यारोपित किया जाता है ),बाँझपन के उपचार संबंधी स्थितियां भी उच्च रक्तचाप से संबंध रखती हैं ।
5) इसके अतिरिक्त ये भी पूछा जाता है, कि ये पहली गर्भावस्था है या आपका पहले से ही कोई शिशु है, और ऐसी स्थिति में कहीं आपको पिछली किसी भी गर्भावस्था में प्रीक्लेम्पसिया की शिकायत तो नहीं थी, यदि हाँ, तो इससे भी आपको वर्तमान गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप होने की संभावना बढ़ जाती है।
6) डॉक्टर आपकी पिछली डिलीवरी की समयावधि और डिलेवरी के तत्काल बाद नवजात के वज़न के बारे में पूछेंगे । साथ ही आपका वजन, आपकी लंबाई और दोनों हाथों के ब्लड प्रेशर को एक साथ लिया जाता है, जो कि 2 से 5 मिनट के अंतराल से दो बार लेते हैं ब्लड प्रेशर मापने की इस विधि को मीन अर्टिरिअल प्रेशर कहतें हैं, मोटापा, छोटी कद काठी, और मीन आर्टिरियल प्रेशर का अधिक आना प्री-एक्लेमप्सिया होने की सम्भाना बढ़ाता है ।
ये सारी जानकारी इकट्ठा करने के बाद सभी सूचनाओं को एक कंप्यूटर जनित विशिष्ट कैलकुलेटर में डाला जाता है, ताकि पता चल सके कि आपको तात्कालिक प्रेग्नेंसी में प्रीक्लेम्पसिया और फीटल ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन की संभावना कितने प्रतिशत है, जब आपके डॉक्टर कहते हैं कि आपको प्री-एक्लेमप्सिया हो सकता है या आप अधिक जोखिम में हैं, तो वे आपके द्वारा दी गई जानकारी और परिक्षणों के परिणामों के आधार पर एक अंदेशा लगाते हैं, जो महिलाएं उच्च जोखिम वाली श्रेणी में आती हैं, उनको इस संभावना से बचा पाने के लिए निवारक दवा जिसे इकोस्पिरिन कहते हैं, प्रदान की जाती है, यकीन मानिए ये काफ़ी प्रभावकारी होता है । क्या ये रोमांचित करने वाली बात नहीं है, कि गर्भावस्था के प्रारंभिक चरण में ही इन संभावनाओं का अंदाज़ा इतने जल्दी लगा पाने में हम समर्थ हैं, ताकि हम डॉक्टरों और आपको उचित देखभाल और प्रबंधन के साथ प्रीक्लेम्पसिया और फीटल ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन को रोकने का अवसर प्राप्त हो सके । पर इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है, कि आप अपने डॉक्टर के पास प्रेग्नेंसी के 11 से 13 सप्ताह के बीच में भी अवश्य परामर्श लें और इस दौरान सोनोग्राफी की जाँच करायें ।

11) सर्जरी/ शल्य प्रक्रिया के लिए :-
उच्च केंद्रों पर गर्भावस्था की पहली तिमाही में अल्ट्रासाउंड के माध्यम से गर्भाशय के आंतरिक संरचना देखी जाती है, ताकि इसके साथ साथ कुछ छोटी आवश्यक सर्जीकल प्रक्रिया की जा सके, तात्कालिक गर्भावस्था को बिना नुकसान पहुचाये जैसे,
अ‍) कोरियोनिक विलस सैंपलिंग- यह एक ऐसी जांच है जिसमें संदेह की स्थिति में विकसित हो रहे भ्रुण की गुणसूत्रीय असामान्यताओं को देखने के लिए एक बारीक नीडल/ सुई के माध्यम से अपरा/ प्लेसेंटा के कुछ नमूने लिए जाते हैं, नीडल का गर्भाशय में प्रवेश सही तरीके से हो और विकसित हो रहे भ्रूण को किसी प्रकार की क्षति न हो इसके लिए सोनोग्राफी में देखते हुए नीडल का मार्ग और दिशा तय की जाती है यह जाँच गर्भावस्था के 10 से 12 हफ़्तों के बीच होती है .

ब) इसी प्रकार एक और जांच है जिसे एमनियोसेंटेसिस कहते हैं, जिसमें की एमनीओटिक फ्लूइड या वो तरल जो विकसित हो रहे भ्रूण को चारों ओर से घेरता है और जिसके माध्यम से भ्रूण को पोषण भी प्राप्त होता है, तो एमनियोसेंटसिस में इसी तरल का सैंपल/ नमूना लिया जाता है, संदिग्ध स्थिति में कि भ्रूण का विकास सही है या नहीं, या इसमें कोई जन्मजात बीमारी तो नहीं इसका पता इस तरल का सैम्पल ले कर किया जाता है, चूंकि इस तरल में विकसित हो रहे भ्रूण की त्वचा से कुछ कोशिकायें और कुछ विशेष प्रकार के प्रोटीन भी स्त्रावित होते रहते हैं, जिनका विशेष प्रयोगशालाओं में अध्ययन कर भ्रूण की गुणसूत्रीय संरचना देख कर यह पता लगा सकते हैं, कि कहीं कोई जन्मजात विसंगति तो नहीं ।

स) सर्वाइकल इंसर्क्लेग के पहले – उन गर्भवती महिलाओं में जिनकी सर्वाइकल लेंथ ( बच्चादानी का मुह) छोटा होता है, जिसके कारण गर्भपात का खतरा होता है या उन महिलाओं में जिनके पहले भी कई गर्भपात बच्चादानी का मुह खुल जाने के कारण हुए हैं, तो ऐसी स्थिति में सोनोग्राफी के दिशा निर्देश से गर्भाशय का मुह टांकों से बंद किया जाता है, ताकि असामयिक गर्भपात से बचा जा सके इस प्रक्रिया के लिए भी टांको की दिशा और सही जगह सोनोग्राफी में देखते हुए तय की जाती है ।

12) गर्भावस्था की समाप्ति से पहले :-
अनचाहे गर्भधारण की स्थिति में गर्भपात के पहले ये तय कर पाना की गर्भ का प्रत्यारोपण सही स्थान पर है, या नहीं ये सिर्फ सोनोग्राफी के माध्यम से पता किया जा सकता है, जो कि गर्भपात से पहले बहुत आवश्यक होता है। स्त्रीरोग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन के बिना और अल्ट्रासाउंड के बिना समाप्ति की दवा लेना खतरनाक है और अगर यह एक्टोपिक गर्भावस्था का मामला हुआ तो मात्र सोनोग्राफी ही वो जाँच है, जिसके माध्यम से इसकी सही स्थिति पता कि जा सकती है हालांकि एक्टोपिक होने की सम्भावनाए भी बहुत कम होती हैं, लेकिन किस महिला को ये हो सकता है या नहीं हो सकता इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता । मैं ये बताना इसलिए भी जरूरी समझ रही हूँ, क्योंकि आये दिन हम ऐसी स्थिति का सामना करते हैं, महिलाएं महीने चढ़ जाने पर अपने घर पर बिना किसी अधिकृत चिकित्सक के मार्गदर्शन के या फिर पिशाब के माध्यम से होने वाली यूपीटी किट का इस्तेमाल करके खुद ही घर पर गर्भावस्था की पुष्टि कर गर्भपात की दवाएं ले लेती हैं, इनमें से जो एक्टोपिक के मामले होते हैं, उसमें अत्यधिक रक्तस्त्राव के साथ ही प्रत्यारोपण का स्थान फट जाता है, और अत्यधिक आंतरिक रक्तस्त्राव के कारण ऐसी स्थिति बनती है, कि महिला की जान बचा पाने के लिए डॉक्टर्स के पास बड़ा ही कम समय बचता है और अत्यधिक प्रयास करने पड़ जाते हैं ।
एक अतिरिक्त जानकारी जो मैं साझा करना चाहती हूँ, वो ये है कि प्रारंभिक गर्भावस्था के अल्ट्रासाउंड स्कैन में बहुत प्रायः एक स्वस्थ सामान्य गर्भ ही देखने को मिलता है, लेकिन इसके बाद मुख्य रूप से जो देखने में आता है वो है गर्भ की थैली या गेस्टेशनल सैक के आस पास रक्त स्त्राव की समस्या जिसे सबकोरियोनिक ब्लीडिंग भी कहते हैं, एक्टोपिक प्रेग्नेंसी और मिस्ड एबॉर्शन जिनके बारे में यदि उचित समय में उचित उपचार दिया जाए तो हम वास्तव में सबकोरियोनिक ब्लीड वाली गर्भावस्था को खतरे से बचा सकते हैं, और यदि चीजें अनुकूल नहीं हैं जैसे कि एक्टोपिक प्रेगनेंसी या मिस्ड एबॉर्शन, तो हम समय रहते आगे की गंभीर जटिलताओं को रोकने के लिए उचित उपचार कर सकते हैं, एक्टोपिक प्रेगनेंसी जैसी घटनाओं का पता पहले ही लग जाये तो यह कई मामलों में प्रजनन क्षमता को बचाने में भी मदद करता है । सभी प्रकार की संभावनाओं को आपके सामने रखने का मेरा उद्देश्य आपको डराना नहीं बल्कि जागरूक करना है। दुर्भाग्य से जनसामान्य इसके महत्व और स्थिति की गंभीरता को नहीं समझते, और पहली तिमाही के अल्ट्रासोनोग्राफी के लिए रेडियोलॉजी/ सोनोग्राफी विभाग में आने वाली ज्यादातर महिलाओं की संख्या दुर्घटना और आपातकालीन स्थितियों से होती है जैसे महीने ठहरने के बाद रक्तस्त्राव की समस्या या अत्यधिक पेट दर्द, जबकि एंटिनेटल रूटीन चेकअप या स्वेक्षित जांच के लिए इस उद्देश्य से आना, की सब ठीक है या नहीं, कम ही होता है । ये बात सभी को समझनी चाहिए कि उचित समय पर डॉक्टर्स से परामर्श और सोनोग्राफी करवाना हमेशा किफ़ायती ही साबित होता है, क्योंकि वस्तुस्थिति का पता होने पर गर्भ की देखरेख के लिए उचित योजना बना पाने में डॉक्टर्स को समयानुसार मदद मिलती है, जिससे कि एक स्वस्थ गर्भावस्था के लिए शुरू से ही कदम उठाए जाते हैं, और जब स्वस्थ बच्चा पैदा होता है तो वो बीमार भी कम पड़ता है ।

प्रश्न 3) प्रारंभिक अवस्था की सोनोग्राफी कराना इतना महत्वपूर्ण क्यों है? क्या मुझे अगर कोई बीमारी है, तो इसका असर मेरे बच्चे के प्रारंभिक विकास पर भी पड़ सकता है, प्रारंभिक अवस्था की सोनोग्राफी इस दिशा में कैसे मदद कर सकती है ?

हैरानी की बात है, कि गर्भ के भीतर अगर कोई छोटी या बड़ी गड़बड़ हो रही हो तो, बहुत से मामलों में या तो कोई संकेत नहीं मिलते या केवल योनि में रक्तस्राव या पेट के निचले हिस्से में दर्द का संकेत आता है, इससे पहले कि देर हो जाए शुरुआत की अवधि में ही स्कैन करने से गर्भ की असामान्यताओं को कम करने में मदद मिलती ही है, यदि वास्तव में समय रहते जाँच करवा ली जाए तो गर्भ को बचा पाने के साथ साथ थोड़ी बहुत असामान्यताओं का इलाज समय रहते किया जा सकता है । और साथ ही अगर सब कुछ सामान्य है तो आपको एक मानसिक संतुष्टि और सुनिश्चितता प्राप्त होती है, ऐसी मानसिक संतुष्टि का होना गर्भावस्था की शुरुआत में बहुत आवश्यक है, क्योंकि गर्भावस्था की शुरुआत वास्तव में तेजी से होने वाला चरणबद्घ घटनाक्रम है, जब विकासशील भ्रुण और साथ ही माँ का शरीर एक साथ बहुत सारे परिवर्तनों से गुजरते हैं।
जैसा कि आपने पूछा और जानना महत्वपूर्ण भी है, कि पहली तिमाही की सोनोग्राफी तब और भी जरूरी हो जाती है, जब पहले से ही आप को कोई बीमारी हो या शरीर की कार्यप्रणाली में कोई असामान्यता हो, पहले की समस्या जैसे
*हृदय रोग,
*गंभीर फेफड़ों के रोग (अस्थमा आदि),
*गुर्दे की गंभीर बीमारियाँ (जैसे गुर्दे की विफलता और प्रत्यारोपण),
*अंतःस्रावी रोग (विशेषकर मधुमेह थाइराइड ग्रंथि की बीमारियां हाइपोथायरायडिज्म और हाइपरथायरायडिज्म)
*हिमेटोलॉजिकल विकार (सिकल सेल रोग और थैलेसीमिया इत्यादि),
*पहले से ही चली आ रही उच्च रक्तचाप की समस्या
*तंत्रिकीय तंत्र/ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर की समस्या जिसका लंबे समय से इलाज चल रहा हो (जैसे कि मिर्गी या झटके आना),
*मनोरोग संबंधी विकार (मनोविकृति, गंभीर अवसाद आदि),
*स्त्रीरोग संबंधी विकार (गर्भाशय की विकृति कोई बड़ी गाँठ),
*संक्रामक रोग जैसे कि हेपेटाइटिस/ पीलिया, टॉक्सोप्लाज्मोसिस, एचआईवी संक्रमण, सिफलिस और अन्य एसटीडी/ यौन संचारित रोग, तपेदिक,
*नशीली दवाओं की लत,
कहने का मतलब है हर वो बीमारी जिसके लिए विशेष उपचार की आवश्यकता होती है ।
पिछले प्रजनन में कोई तकलीफ़ से संबंधित कारक
*अंतर्गर्भाशयी या प्रसवकालीन मृत्यु,
*पिछली प्रेग्नेंसी में उच्च रक्तचाप की समस्या
*खराब प्रसवकालीन अनुभव (समयपूर्व समाप्ति, अंतर्गर्भाशयी भ्रूण मृत्यु, नवजात को झटके आने की समस्या, शुरुआती दिनों में आईसीयू में भर्ती );
*बार-बार गर्भपात;
*बांझपन।
तात्कालिक गरर्भावस्था से संबंधित समस्याएं :
*बार बार पिशाब संबंधित संक्रमण का होना जिसे यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन कहते हैं;
*खून की अत्यधिक कमी जो की किसी गंभीर रक्त दोष के परिणाम स्वरूप भी हो सकती है जैसे थैलासीमिया, सिकल सेल अनीमिया,
*तात्कालिक गर्भावस्था के साथ हाल ही में हुआ संक्रामक रोग;
*तात्कालिक प्रेग्नेंसी के कारण मधुमेह/ गेस्टेशनल डाईबिटीस ;
*गंभीर मातृ कुपोषण;
*अत्यधिक मोटापा या अत्यधिक कम वज़न।
अब इन उल्लेखित कारकों में से आप को सभी के बारे में गंभीर होने की या चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, मैंने जागरूकता के उद्देश्य से ज़्यादा से ज़्यादा संभव और प्रमुख कारकों को एक साथ बताने का प्रयास किया है । मेरे कहने का मतलब है, कि अगर आपको कोई लंबे समय से बीमारी है या हाल फ़िलहाल की कोई भी बीमारी है, तो दोनों ही स्थिति में आपको सारी जानकारी खुल कर अपने डॉक्टर को बतानी चाहिए, इससे वर्तमान गर्भावस्था अवश्य ही प्रभावित हो सकती है । सामान्य जन की कुछ अवधारणाओं में से एक ये है, कि शरीर की अन्य बीमारियों का वर्तमान गर्भावस्था से कोई लेना-देना नहीं है, और ये इसे बिल्कुल प्रभावित नहीं करेगा, इसलिए वे पिछली चिकित्सा बीमारी या फ़िलहाल चल रहे कोई उपचार / दवा को डॉक्टर से बताना जरूरी नहीं समझते या जान बूझ कर इसे छिपाने का प्रयास करते हैं ।
बताए गए सारे मामले ऐसे हैं, जहां विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है, और कई बार तो ऐसा भी होता है कि गर्भवती महिला को अपनी बीमारी के बारे में पहली बार जानकारी तब मिलती है, जब वो किसी स्त्रिरोग विशेषज्ञ के पास पहली बार गर्भवस्था के परामर्श के लिए जाती है । आम तौर पर लोग शुरुआती परामर्श को जरूरी नहीं समझते उनमें इससे बचने की या देर से परामर्श लेने की प्रवृत्ति होती है, जो की एक गलत आदत है, जबकि लोगों को इसकी गंभीरता समझनी चाहिए । और किसी भी बीमारी की दशा में गर्भावस्था के लिए आगे प्रबंधन और जल्द से जल्द स्थिति को नियंत्रण में पाने के उद्देश्य से शुरुआती माह की सोनोग्राफी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

प्रश्न 4) यह अल्ट्रासाउंड स्कैन कैसे किया जाता है ? क्या कोई संभावना है, कि यह मेरे भ्रूण को नुकसान पहुंचाएगा ?

यह एक सरल प्रक्रिया है, इसमें कोई दर्द या सुई चुभाना जैसी कोई प्रक्रिया शामिल नहीं होती । क्लिनिक या अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर के कुछ सहकर्मियों द्वारा आपसे कुछ प्रमुख जानकारियां ली जाती हैं, जैसे आपका नाम, आयु, निवासस्थान, पति का नाम, आपका पहचान पत्र । हम रेडियोलॉजिस्ट सोनोग्राफी शुरू करने के पूर्व आपकी दवा का पर्चा देखते हैं, जिसमें आपकी मुख्य जानकारी दी होती है जैसे ब्लड प्रेशर, कुछ मूल शारीरिक जांचों की जानकारी , कुछ खून की जांचों की जानकारी, ली जाने वाली दवाएं इत्यादि , हम पहले की किसी बीमारी की जानकारी लेते हैं, पिछले गर्भ की संख्या और उसका मोटा मोटा ब्यौरा, प्रासंगिक जटिलताएं अगर हों तो उनके बारे में पूछ सकते हैं, माहवारी की अंतिम तिथि और उसकी नियमितता के बारे में पूछते हैं, इसके साथ ही आपसे संबंधित इनमें से कुछ बेसिक जानकारियां जैसे आपका नाम, उम्र, अंतिम माह की तिथि इत्यादि अल्ट्रासाउंड की स्क्रीन पर डाल दी जाती हैं । इसके बाद आपको अल्ट्रासाउंड मशीन से सटे परीक्षण टेबल में लेटने के लिए कहा जाता है, हम एक छोटे ट्रांसड्यूसर / प्रोब जो कि एक छोटी प्लास्टिक गेंद जैसा होता है, जो लंबे तारों से अल्ट्रासाउंड मशीन से जुड़ा होता है, के गेंदनुमा भाग के ऊपर एक जैली जैसा तरल चिपचिपा पदार्थ लगाते हैं, और इसे आपके पेट के ऊपर घूमते हैं, ठीक उसके ऊपर जहाँ गर्भ ठहरा हुआ होता है, अल्ट्रासाउंड जैली की थोड़ी मात्रा इस ट्रांसड्यूसर की सूक्ष्म ध्वनि जैसी तरंगों (जो कि हानिकारक नहीं होती ) को पेट के अंदर प्रविष्ठ करने के लिए आवश्यक होती है, और गर्भ से आने वाले प्रतिबिम्ब को यही ट्रांसड्यूसर ग्रहण भी करता है जिसके संकेत अल्ट्रासाउंड मशीन से जुड़े हुए तारों के माध्यम से अल्ट्रासाउंड स्क्रीन में दिखाई देते हैं, वही स्क्रीन जिसमें आपसे संबंधी कुछ मूल जानकारियां पहले डाली गई थीं । ट्रांसड्यूसर अल्ट्रासाउंड तरंगों को स्क्रीन में प्रसारित करता है, जिससे कि अल्ट्रासाउंड स्क्रीन पर छवियों या चित्रों और गर्भस्थ शिशु की हरकतें दिखाई देने लगती हैं। हम सिर्फ इस ट्रांसड्यूसर के माध्यम से आपके पेट को छूते हैं और गर्भाशय के अंदर की पूरी छवि तत्काल ही स्क्रीन पर दिखाई देने लगती है, बस इतनी सी तो बात है, न कोई दर्द , न कोई अहसास और न ही चुभन, आपको आराम से लेटना होता है बस ।
क्या आपको नहीं लगता की विज्ञान के ऐसे महान आविष्कारों को प्राप्त करके हम धन्य हुए हैं, जिसमें वास्तव में हम देख सकते हैं, कि गर्भ के अंदर असल में हो क्या रहा है, बिना उसे परेशान किये जो असल में कोमल ध्वनि तरंगों के माध्यम से देखा जाता है, रेडिएशन/ विकिरण जैसा कोई खतरा नहीं होता इनमें, और इतना दक्ष की तत्काल ही छवि बनाने की क्षमता रखता है। इन सभी विशेष गुणों के कारण ही अल्ट्रासाउंड मशीन ने पहली तिमाही में सामान्य मानव विकास का अध्ययन करने के लिए उपयोग की जाने वाली अन्य सभी तकनीकों को तेजी से प्रतिस्थापित कर दिया है। मैं यहां एक महत्वपूर्ण बात का उल्लेख करना चाहूंगी कि अल्ट्रासाउंड देखने की एक और विधा जिसे ट्रांस-वेजाइनलअल्ट्रासाउंड (टीवीएस) कहतें हैं, की उपलब्धता ने शुरुआती गर्भावस्था की बारीकियों को समझने और पकड़ने की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव लाये हैं, इसमें फ़ायदा ये होता है, कि यह पेट से की जाने वाली सोनोग्राफी की तुलना में ज्यादा स्पष्ठ और बारीकी से छवियां प्रदान करता है, क्योंकि शुरुआत का गर्भ बहुत छोटा होता है कई बार एक सेंटीमीटर से भी कम तो इसके अंदर की विस्तृत जानकारी पेट के माध्यम से ले पाना मुश्किल हो जाता है, इसमें एक पतला और लम्बा ट्रांसड्यूसर योनि के रास्ते से डाला जाता है, क्योंकि इस मार्ग से ट्रांसड्यूसर भ्रूण के ज्यादा करीब होता है, तो यह ज्यादा स्पष्ट चित्र प्रदान कर सकता है। यदि हम डॉक्टर ये कहें कि ट्रांसवेजिनल अल्ट्रासाउंड की आवश्यकता है, तो आपको इसकी प्रक्रिया को पूरी तरह से समझाया जाएगा और आपकी अनुमति इसके लिए ली जाएगी, इसलिए यदि रेडियोलॉजिस्ट टीवीएस स्कैन के लिए कहते हैं, तो कृपया असहज महसूस न करें और इसमें अपने डॉक्टर को पूरा सहयोग दें , इससे आपके गर्भ के विकास के संबंध में ज्यादा पुख्ता जानकारी मिलती है, क्योंकि कई बार बारीक जटिलताएं पेट से होने वाली अल्ट्रासोनोग्राफी जाँच में छूट जाती हैं । याद रखें पेट या ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड के कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं होते हैं। आप जाँच के तत्काल बाद ही आपकी रोज़मर्रा की गतिविधियों में लग सकती हैं जैसे कि कुछ हुआ ही न हो ।

प्रश्न 5) मुझे शुरुआती अल्ट्रासाउंड के लिए डॉक्टर्स से कितनी बार परामर्श लेना चाहिए ?

जैसा कि ये आपका पहला गर्भ है, और हाल फ़िलहाल ही आपके महीने रुके हैं, ठीक इसी समय आपको पहला अल्ट्रासाउंड स्कैन कराना चाहिए, इससे आपको पहली जानकारी ये मिलेगी की वाकई गर्भ प्रत्यारोपित हुआ है या नहीं या फिर महीनें रुकने का कोई और कारण है, खाली महीने चढ़ना भी आम बात है, कभी कभी ये शारीरिक या मानसिक तनाव से या शरीर में अन्तरस्त्रवी/ होर्मोनल कार्यप्रणाली में थोड़ी बहुत अनियमितता के कारण भी हो सकता है या फिर शरीर में विकसित हो रही कोई बड़ी या छोटी बीमारी में भी ऐसा हो जाता है, कभी कभी महीनें अकारण भी चूक जाते हैं ये कोई बड़ी बात नहीं है । जब भी आप महीनें चूकने के बाद पहली बार डॉक्टर्स से परामर्श के लिए जाती हैं, तो सबसे पहले वे आपको यूरिन प्रेग्नेंसी टेस्ट की सलाह देते हैं, जिसमें पिशाब के नमूने/ सेम्पल की जाँच से यदि प्रेग्नेंसी का संकेत मिलता है, तो डॉक्टर्स आपको सोनोग्राफी की सलाह देते हैं, ताकि गर्भ के अंतः गर्भशायी होने की पुष्टि हो यानि ये सुनिश्चित किया जा सके कि विकसित हो रहा भ्रूण गर्भाशय के फंडस में है या नहीं, अगर है, तो यह गर्भावस्था के कौन से चरण में है, क्या यह मासिक धर्म की समयावधि के अनुरूप है या गर्भ की बढ़त और मासिक चक्र से गिने दिनों में कोई अंतर है ? क्या विकसित हो रहे भ्रूण में धड़कन आ गयी है ? सोनोग्राफी में आयी रिपोर्ट के आधार पर ही आगे का निर्णय लिया जाता है, यदि सब कुछ ठीक है और गर्भ फन्डस में ही प्रत्यारोपित होने के साथ साथ इसमें सामान्य दर से धड़कन आना भी सुनिश्चित हो जाए, तो डाक्टर्स आपको अगली सलाह NTNB स्कैन (लगभग 11 से 13 हफ़्ते के बीच) के लिए देते हैं। लेकिन अगर गर्भ का विकास शुरुआती चरण में है, जैसे कि धड़कन नहीं आयी है तो ठीक इसके 1 से 2 सप्ताह के भीतर ही आपको धड़कन की पुष्टि के लिए अगली सोनोग्राफी की सलाह दी जाएगी, ये बहुत आवश्यक हो जाता है । इसके अतिरिक्त बीच में कभी कोई जटिलता आने की स्थिति में जैसी रक्तस्त्राव या अत्यधिक दर्द या कोई बड़ी बीमारी या संक्रमण जैसी जटिलता आने पर वस्तुस्थिति जानने के लिए की गर्भ के अंदर सब ठीक है या नहीं या गर्भ को संरक्षित करने के लिए कितने और किस दिशा में प्रयास किये जाने चाहिए इसकी सही रूपरेखा बनाने के लिए सोनोग्राफी जरूरी हो जाती है । पहली तिमाही के अंत में (लगभग 11 से 13 हफ़्ते) एक और परामर्श NTNB स्कैन के लिए भी लिया जाना जरूरी है, जैसा कि मैंने पहले ही बताया ताकि संरचनात्मक जटिलताओं के साथ ही प्रीक्लेमप्सिया और फीटल ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन की संभावना का पता लगा कर उचित इजाल की दिशा में समय रहते कदम उठाये जा सकें ।

प्रश्न 6) अगर सोनोग्राफी की जाँच में कुछ असामान्यता आती है तो क्या होगा?

जैसा कि मैंने आपको पहले ही संभावित जटिलताओं के बारे में विस्तार से बताया है, जो अमूमन सामान्य समझ आ रही गर्भावस्था के साथ भी देखी जा सकतीं हैं, तो अल्ट्रासाउंड में दर्शाई जटिलताओं के अनुसार आपके डॉक्टर आगे के इजाल की रूपरेखा तय करते हैं, हर स्थिति के लिए विशेष दिशानिर्देश और प्रोटोकॉल का पालन किया जाता है। चिंता करने की कोई बात नहीं है, परिस्थितियों के अनुसार जो आपके लिये सर्वोत्तम है, आपके डॉक्टर्स वही फैसला लेते हैं ।आपको या आपके परिजनों को वस्तुस्थिति से भलीभांति अवगत कराया जाएगा और सही निर्णय और इजाल की दिशा में आपको पूरा सहयोग दिया जाएगा ।

प्रश्न 7) अगर सब कुछ सामान्य है तो मुझे क्या करना चाहिए?

यह तो बहुत अच्छी बात है यदि सब कुछ सामान्य है । आपके डॉक्टर अन्य आवश्यक रक्त जांच के साथ रिपोर्ट्स देखेंगे और आपको आपकी आवश्यकता के अनुसार दवा की सलाह दी जाएगी और इन सभी जांचों की रिपोर्ट के आधार पर अगली बार परामर्श के लिए कब आना है, ये भी बताया जाएगा । गर्भावस्था के स्वस्थ होने की जानकारी आपको और आपके डॉक्टर को एक मानसिक संतुष्टि प्रदान करती है, जो की शुरुआती समयावधि में बहुत महत्वपूर्ण बात है।

प्रश्न 8) क्या अल्ट्रासाउंड परीक्षण के लिए अन्य रिपोर्टों को ले जाने की आवश्यकता होती है ?

मुझे खुशी है कि आपने यह प्रश्न पूछा । यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है, जब भी आप अपने प्रसूति विशेषज्ञ या रेडियोलॉजिस्ट के पास जातीं हैं, तो सभी पिछली और हाल की जाँच रिपोर्ट और परामर्श पत्र / प्रेस्क्रिप्शन आपने साथ रखें । रिकॉर्ड हमेशा किसी भी डॉक्टर के लिए क्रमबद्ध जांच पड़ताल में मदद करते हैं, जैसे कि यदि पहले के अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में वास्तव में कोई असामान्यता या किसी महत्वपूर्ण बात का उल्लेख है, तो डॉक्टर आपको बता सकते हैं, की पिछली रिपोर्टिंग की तुलना में इस बार कितना सुधार हुआ है, निश्चित तौर पर आपको इससे राहत मिलती ही है । या फिर ऐसा भी हो सकता है कि बहुत अधिक सुधार न भी हुआ हो या कोई अन्य नई जटिलता सामने आ जाये, तो ऐसे मामलों में आपके डॉक्टर आपको स्थिति से निपटने के लिए कुछ सावधानियां या निवारक उपाय की सलाह दे सकता है, और आपको एवं परिजनों को समस्या की गम्भीरता के हिसाब से सामना करने के लिए उचित मानसिकता बनाने और स्थिति से निपटने के लिए प्रोत्साहित करते हैं । इसके अलावा पिछली रिपोर्ट्स तात्कालिक स्कैन की तुलना में आपके बच्चे के विकास का तुलनात्मक अध्ययन करने में मदद करतीं हैं, और यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है यदि आप अपनी पिछली माहवारी की तारीख भूल जाती हैं, खास कर उन मामलों में जब बच्चा बताई गई तारीखों के अनुसार उचित वृद्धि नहीं दिखा रहा हो। बच्चे का विकास जब माहवारी की तारीखों से मिलान नहीं करता है तो यह या तो अनियमित मासिक धर्म के कारण हो सकती है, या लेक्टेशनल एमेनोरिया के मामलों में हो सकता है, जिसमें की लम्बी समयावधि तक महीने नहीं आते क्योंकि आपका पिछला बच्चा अभी भी स्तनपान कर रहा होता है, ऐसी स्थितियों में यह बता पाना की बच्चे के विकास की सटीक तुलनात्मक वृद्धि हुई है यह पिछली अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में दी गयी डिलवरी की तारीख देखकर ही बताया जा सकता है, और इनमें भी पहली अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट की तारीख सबसे महत्वपूर्ण होती है । मेरा आपसे अनुरोध है, कि कृपया अपनी सारी संबंधित जाँच रिपोर्ट को अपने प्रसूति विशेषज्ञ और अपने रेडियोलॉजिस्ट के पास अवश्य ले जाएं ।

प्रश्न 9) क्या पहली तिमाही के अल्ट्रासाउंड स्कैन से पहले किसी भी तैयारी की आवश्यकता है ?

बहुत अधिक तैयारी की आवश्यकता नहीं है, लोगों को कुछ भ्रांति ये होती है, कि यह जांच खाली पेट होती है, जिसकी बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती, महिलाएं हमारे पास सोनाग्राफी के लिए ज्यादातर खाली पेट आती हैं, जबकि वास्तव में तो गर्भाशय के अंदर विकसित हो रहे गेस्टेशनल सैक के अंदर का पानी ही सोनोग्राफी के लिए अच्छी छवि बनाने के लिए और आंतरिक संरचना की जानकारी के लिए बेहतरीन माध्यम का काम करता है, और अल्ट्रासाउंड मशीन के ट्रांसड्यूसर/ प्रोब में जैली रूपी तरल लगाने का मुख्य कारण यहि होता है, कि इसकी सूक्ष्म तरंगों को पेट के अंदर प्रवेश पाने के लिये पानी जैसा माध्यम मिल सके, फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप खाली पेट आ रहीं है या नहीं, परंतु खाली पेट होना आपके बच्चे की सेहत के लिए सही नहीं है, क्योंकि कई बार सोनोग्राफी की जांच के लिए घंटो इंतज़ार करना पड़ता है, और इस गर्भावस्था के संवेदनशील क्षणों में आपके ऊपर खुद के स्वस्थ के साथ ही अंदर पल रहे बच्चे की सेहत की भी जिम्मेदारी होती है, तो कृपया घर से पर्याप्त आहार पा कर ही आएं और साथ में बीच के लिए थोड़े बहुत नाश्ते की व्यवस्था भी करके चलें । हां, अगर पेट साफ है तो ये निश्चित तौर पर मदद करता है, क्योंकि इससे पेट में आपकी आंतों के अंदर ज्यादा गैस जमा नहीं होती और भ्रूण की छवि ज्यादा स्पष्ठ बनती है। पिशाब की थैली थोड़ी बहुत भारी होनी चाहिए लेकिन पिशाब इतनी भी नहीं रोकनी है कि आपको असुविधा होने लगे। आरामदायक हल्के और ढ़ीले कपड़े पहनना सुविधाजनक होता है, ताकि आपके पेट की जांच आसानी से की जा सके। इसके अलावा आपको डॉक्टर के पर्चे, पिछली जांचे, अपना पहचान पत्र, रक्त जांचे और सोनोग्राफी की पिछली रिपोर्ट साथ में लानी चाहिए और यदि इनफर्टिलिटी/ बाँझपन की समस्या के लिए इलाज चला है, तो उन सभी रिकॉर्डों से भी जानकारी पाने में मदद मिलती है ।

This is a public information article provided as a health education service by Samrakshan. You should always consult your doctor for any assessment or treatment.

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